हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के इतिहास और उसके विकास के बारे में बताना, मानो भारत में 85 वर्षों से भी अधिक हुए एरोनॉटिकल उद्योग के विकास को बताने के समान है ।



वर्ष 1939 में, एक अंतरमहाद्वीपीय उड़ान के दौरान उद्योगपति सेठ वालचंद हीराचंद की मुलाकात हार्लो एयरक्राफ्ट कंपनी के निदेशक विलियम डगलस पावले से हुई । संयोग से हुई इस मुलाकात ने ही दिनांक 23 दिसंबर, 1940 को बेंगलूरु में हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में भारत की यात्रा का प्रारंभ हुआ ।

मैसूर के शाही वंशज के महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार ने उसी समय सितंबर 1940 को सिंहासन संभाला था । जैसे ही उन्हें उद्योगपति की विमान विनिर्माण कंपनी शुरू करने की योजना के बारे में पता चला, तो उस युवा राजा ने इस महत्त्वपूर्ण लक्ष्य को पूरा करने के लिए उदारतापूर्वक 700 एकड़ की बहुमूल्य भूमि दान कर दी, साथ ही, उन्होंने इस उद्यम के लिए रु. 25 लाख का निवेश भी किया, जबकि अन्य रियासतों ने इस कार्य में सहायता करने से साफ इनकार कर दिया था ।

मैसूर के दीवान सर मिर्ज़ा इस्माइल ने भी उनकी इस पहल में उनका समर्थन किया । इन दूरदर्शी लोगों के अग्रणी प्रयासों की बदौलत ही भारत 1940 के दशक में ही एक एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनी की स्थापना करने में समर्थ हो पाया ।

भारत में एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग के उद्देश्य से तत्कालीन मैसूर सरकार के सहयोग से दूरदर्शी श्री वालचंद हीराचंद द्वारा बेंगलूर में मूल रूप से हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड के रूप में स्थापित इस कंपनी को दिनांक 23 दिसंबर, 1940 को निगमित किया गया । मार्च 1941 में, भारत सरकार भी इस कंपनी का एक शेयरधारक बन गया और बाद में 1942 में सरकार ने इसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया । अमेरिका की इंटर कॉन्टिनेंटल एयरक्राफ्ट कंपनी के सहयोग से, कंपनी ने हार्लो ट्रेनर, कर्टिस हॉक फाइटर और वल्टी बॉम्बर विमानों के विनिर्माण का कारोबार शुरू किया ।  

जनवरी 1951 में, हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड का  प्रशासनिक नियंत्रण भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन रखा गया ।

कंपनी ने लाइसेंस के तहत प्रेंटिस, वैम्पायर और नैट जैसे विदेशी अभिकल्पन के विमानों और इंजनों का विनिर्माण किया था । कंपनी द्वारा स्वदेशी स्तर पर विमानों के अभिकल्पन और विकास का भी कार्य संपन्न किया गया । अगस्त 1951 में, डॉ. वी.एम. घाटगे के कुशल नेतृत्व में कंपनी द्वारा अभिकल्पित और निर्मित एचटी-2 ट्रेनर विमान ने पहली बार उड़ान भरी । करीब 150 से अधिक ट्रेनर विमानों का निर्माण भी किया गया और भारतीय वायुसेना और अन्य ग्राहकों को इसकी आपूर्ति की गई । अपनी अभिकल्पन क्षमता के क्रमिक विकास के साथ, कंपनी ने चार अन्य विमानों का सफलतापूर्वक अभिकल्पन और विकास किया, जिनमें, फ्लाइंग क्लबों के लिए उपयुक्त दो सीटों वाला ‘पुष्पक’, एयर ऑब्ज़र्वेटरी पोस्ट (एओपी) की भूमिका के लिए ‘कृषक’, एचएफ-24 जेट फाइटर ‘(मारुत)’ और एचजेटी-16 बेसिक जेट ट्रेनर ‘(किरण)’ शामिल हैं ।  

इसी बीच, अगस्त 1963 में, एरोनॉटिक्स इंडिया लिमिटेड (एआईएल) को भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी के रूप में निगमित किया गया, ताकि लाइसेंस के तहत मिग-21 विमानों का निर्माण किया जा  सके । नासिक (महाराष्ट्र) और कोरापुट (ओड़िशा) में कारखाने स्थापित किए गए । जून 1964 में, एचएस-748 परिवहन विमान के लिए एयरफ्रेम बनाने हेतु 1960 में वायुसेना इकाई के रूप में कानपुर में स्थापित विमान निर्माण डिपो का हस्तांतरण एआईएल को कर दिया गया । इसके तुरंत बाद ही, ऐसी स्थिति में जहाँ देश में तकनीकी प्रतिभाएँ सीमित थीं, सरकार द्वारा विमानन के क्षेत्र में संसाधनों को संरक्षित करने के उद्देश्य से एयरक्राफ्ट इंडिया लिमिटेड (एआईएल) के साथ हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को समामेलित करने का निर्णय लिया, ताकि अति दक्षता और किफायती ढंग से एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग यूनिटों के कार्यकलापों को योजनाबद्ध तथा समन्वित रूप में संपन्न किया जा सके ।

दोनों कंपनियों अर्थात हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड और एरोनॉटिक्स इंडिया लिमिटेड का विलय दिनांक 1 अक्टूबर 1964 को भारत सरकार द्वारा जारी एक समामेलन आदेश के तहत  हुआ और विलय के बाद कंपनी का नाम “हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल)” रखा गया, जिसका मुख्य व्यवसाय विमान, हेलिकॉप्टर, इंजन और संबंधित प्रणालियों जैसे एवियॉनिक्स, उपकरण और सहायक उपकरण का अभिकल्पन, विकास, विनिर्माण, मरम्मत और ओवरहॉलिंग करना था ।

1970 में, फ्रांस के मेसर्स एसएनआईएएस से लाइसेंस के तहत बेंगलूर में ‘चेतक’ और ‘चीता’ हेलिकॉप्टरों के विनिर्माण के लिए एक अलग प्रभाग की स्थापना की गई । लखनऊ में विमान के उपकरणों और उपसाधनों के विनिर्माण के लिए एक नया प्रभाग भी स्थापित किया गया । पहियों और ब्रेक के लिए यू.के. के मेसर्स डनलप के साथ, अंडर कैरिज और हाइड्रॉलिक उपकरण के लिए डॉटी और केबिन एयर प्रेशराइजेशन और एयर कंडीशनिंग उपकरण के लिए नॉर्मल एयर गैरेट, पैनल उपकरणों और गायरो के लिए यूके के स्मिथ, फ्रांस के एसएफईएनए और एसएफआईएम, इजेक्शन सीटों के लिए यूके के मार्टिन बेकर और इंजन ईंधन प्रणालियों के लिए लुकास के साथ मारुत, किरण, अजीत, चेतक, चीता और जगुआर पर फिटमेंट के लिए लाइसेंस समझौते किए गए । मिग-21 शृंखला के विमान के लिए उपसाधनों के विनिर्माण हेतु यूएसएसआर प्राधिकरणों के साथ इस तरह की व्यवस्था हेतु सहमत हुए ।

बसंत कृषि विमान का अभिकल्पन एवं विकास 1970 और 1974 के बीच किया गया और अजीत, जो कि नैट का उन्नत संस्करण है, का अभिकल्पन एवं विकास 1972 और 1980 के बीच किया गया । 1976 में, एचपीटी-32 एलिमेंटरी पिस्टन इंजन ट्रेनर, किरण एमके II (किरण एमके I / IA का उन्नत संस्करण) और अजीत ट्रेनर के साथ-साथ उन्नत हलका हेलिकॉप्टर के अभिकल्पन एवं विकास के लिए परियोजनाएं स्वीकृत की गईं ।

1973 के दौरान, अंडर-कैरिज और हाइड्रॉलिक सिस्टम, एयर-कंडीशनिंग और प्रेशराइजेशन सिस्टम, ईंधन नियंत्रण/ गेजिंग सिस्टम, जनरेटर नियंत्रण और सुरक्षा इकाइयों, स्टैटिक इनवर्टर आदि जैसे उपसाधनों के अभिकल्पन एवं विकास के लिए लखनऊ में एक डिजाइन विंग की भी स्थापना की गई ।

1979 में, ब्रिटिश एरोस्पेस के साथ लाइसेंस समझौता करने के बाद, कंपनी ने ‘जगुआर’ विमानों और रोल्स रॉयस-टर्बोमेका के साथ एडोर इंजनों का विनिर्माण शुरू किया । एवियॉनिक्स और सहायक उपकरणों के विनिर्माण के लिए भी विभिन्न कंपनियों के साथ लाइसेंस करार किए गए ।

1982 में, इस कंपनी ने यूएसएसआर के साथ एक करार किया और कंपनी के नासिक प्रभाग में मिग-21 बीआईएस के लिए अनुवर्ती परियोजना के रूप में स्विंग-विंग मिग-27एम विमान का उत्पादन शुरू  किया ।

1983 के दौरान, जिला सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) में एचएएल के कोरवा प्रभाग की स्थापना इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (आईएनएस), हेड अप डिस्प्ले और वेपन एमिंग कंप्यूटर (एचयूडीडब्ल्यूएसी), संयुक्त मानचित्र और इलेक्ट्रॉनिक्स डिस्प्ले (कॉमेड), लेजर रेंजर और मार्क्ड टारगेट सीकर (एलआरएमटीएस), जगुआर के लिए ऑटो स्टेबलाइजर और फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और मिग-27एम के लिए इसी तरह की उन्नत प्रणालियों के विनिर्माण के लिए की गई थी ।

आज एचएएल देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों से सक्रिय रूप से संबद्ध है और इस कार्य में अपना योगदान भी दे रहा है । सन् 1988 में अलग से एरोस्पेस प्रभाग की स्थापना भी की गई थी । वर्तमान में एचएएल इस प्रभाग के माध्यम से इसरो के एरोस्पेस प्रक्षेपण यानों और उपग्रहों के लिए स्ट्रक्चर संबंधी आवश्यकताओं को संपन्न कर रहा है । स्ट्रैप-ऑन एल-40 स्टेज बूस्टर की पूर्ण असेंबली के लिए भी बुनियादी सुविधाएँ स्थापित की गयी हैं । एचएएल द्वारा इसरो को जीएसएलवी मार्क III, मंगल मिशन और ह्यूमन क्रू मॉड्यूल के लिए स्ट्रक्चर प्रदान किए गए हैं । एचएएल क्रायोजेनिक इंजनों के विनिर्माण के लिए एक समर्पित सुविधा भी स्थापित कर रहा है ।

औद्योगिक गैस टर्बाइन इंजनों के बढ़ते बाज़ार पर कब्ज़ा करने के लिए, 1998 में औद्योगिक एवं समुद्री गैस टर्बाइन प्रभाग नामक एक नया प्रभाग स्थापित किया गया । लाइसेंस के तहत, 20 मेगावाट क्षमता के एरो डेरिवेटिव, एलएम-2500 समुद्री गैस टर्बाइन इंजन का उत्पादन इस प्रभाग में किया जा रहा है और साथ ही ओवरहालिंग भी की जा रही है । यह प्रभाग औद्योगिक एवन और एलिसन इंजनों की मरम्मत और ओवरहालिंग का कार्य भी करता है । यह प्रभाग देश में मौजूद विभिन्न गैस टर्बाइनों की ओवरहॉलिंग कर रहा है, इस प्रकार ओएनजीसी, गैल, टीएनईबी, आरएसईबी आदि जैसे उपयोगकर्ताओं को उनके गैस टर्बाइन के रखरखाव के लिए लागत प्रभावी सेवाएँ प्रदान कर रहा है ।

बेंगलूर हवाई अड्डे के संचालन में तालमेल बिठाने के उद्देश्य से एचएएल द्वारा मई 2000 में हवाई अड्डे से संबंधित सेवाएँ प्रदान करने हेतु एक स्वतंत्र लाभ केंद्र की स्थापना की गई थी । इस हवाई अड्डा सेवा केंद्र की स्थापना का मुख्य उद्देश्य एयरलाइन संचालन से संबंधित सेवा क्षेत्र की बाज़ार संबंधी वास्तविक  आवश्यकताओं को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ मौजूदा संसाधनों का पुनर्गठित भी करना था और साथ ही, बेंगलूरु में कंपनी के उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं का व्यावसायिक उपयोग भी करना था ।

सुखोई 30 एमकेआई विमानों के लाइसेंस विनिर्माण हेतु रूसी भागीदारों के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर के साथ, नासिक प्रभाग, जो मिग शृंखला के विमानों के विनिर्माण और ओवरहॉलिंग में लगा हुआ था, के लिए इसका विस्तार करना आवश्यक हो गया । तदनुसार, फरवरी 2002 में नासिक में दो प्रभागों की स्थापना करने का निर्णय लिया गया, जिसमें सुखोई 30 एमकेआई के उत्पादन के लिए विमान विनिर्माण प्रभाग और मिग शृंखला के विमानों के ओवरहॉल और उन्नयन के लिए विमान ओवरहॉल प्रभाग की स्थापना हुई ।

रूसी विनिर्माता से लाइसेंस के तहत एसयू 30 एमके 1 विमान के लिए एएल 31 एफपी इंजन का विनिर्माण करने के निर्णय के परिणामस्वरूप, फरवरी 2002 में परियोजना को शुरू करने के लिए कोरापुट में एक नया प्रभाग स्थापित करने का निर्णय लिया गया था । तदनुसार, नए प्रभाग के तहत परियोजना कार्यकलाप शुरू हो गई थीं । हेलिकॉप्टर प्रभाग, बेंगलूर को एएलएच विनिर्माण और संबंधित कार्यकलापों के लिए पूरी तरह समर्पित करने हेतु, चेतक और चीता हेलिकॉप्टरों और उनके विभिन्न प्रकारों के विनिर्माण और मरम्मत/ ओवरहॉल कार्यकलापों को बैरकपुर इकाई को हस्तांतरित कर दिया गया । सन् 2006 में एएलएच ओवरहॉल कार्यकलापों को पूरा करने के लिए बेंगलूर में एक नया एमआरओ प्रभाग बनाया गया ।

कम वज़न के कारण, विमान निर्माण में कंपोजिट सामग्री का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है । मार्च 2007 में एक नया एयरक्राफ्ट कंपोजिट प्रभाग (एसीडी) बनाया गया, जिसमें एएलएच, एलसीए आदि जैसी आंतरिक परियोजनाओं के लिए कंपोजिट सामग्री के निर्माण हेतु एक समर्पित सुविधा उपलब्ध है ।

बेंगलूरु में सामान्य सेवाओं पर प्रभावी और केन्द्रित ध्यान देने के लिए दिसंबर 2007 में सुविधा प्रबंधन प्रभाग का गठन किया गया ।

इसके अतिरिक्त, नवंबर 2012 में, एचएएल हैदराबाद की एक इकाई के रूप में केरल के कासरगोड़ में सामरिक इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्ट्री की स्थापना की गई ।

हलके लड़ाकू विमान (एलसीए) के आंतरिक विकास से हमारी रक्षा सेवाओं के आधुनिकीकरण कार्यक्रम को व्यापक बढ़ावा मिलेगा । एलसीए के उत्पादन के लिए, मार्च 2014 में बेंगलूरु में एक अलग एलसीए तेजस प्रभाग की स्थापना की गई ।

स्वदेशी लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (एलयूएच) के निर्माण के लिए एक नई एकीकृत सुविधा बेंगलूरु के पास तुमकुरु में स्थापित की जा रही है, जिसके लिए आधारशिला 3 जनवरी 2016 को रखी गई थी । एचएएल ने 29 दिसंबर 2018 को ग्रीनफील्ड हेलिकॉप्टर विनिर्माण सुविधा, तुमकूरु से लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (एलयूएच) की उड़ान सफलतापूर्वक संपन्न की गई ।

एचएएल को 28 मार्च 2018 को बीएसई और एनएसई में सूचीबद्ध किया गया था ।

अनुसंधान एवं विकास केंद्र:

कंपनी के पास एरोस्पेस के क्षेत्र में व्यापक अभिकल्पन एवं विकास क्षमता है । अब तक उत्पादित 31 प्रकार के विमानों में से 17 स्वदेशी अभिकल्पन के हैं । कंपनी को विविध प्रकार के विमानों और उनकी प्रणालियों के अभिकल्पन और निर्माण का लंबा अनुभव है । कंपनी के आगे विकास के लिए, एचएएल के लिए अपनी अनुसंधान एवं विकास क्षमताओं को मजबूत करना आवश्यक समझा गया और तदनुसार, पूर्ववर्ती अभिकल्पन ब्यूरो का पुनर्गठन और पुनर्गठन निम्नलिखित अनुसंधान एवं विकास केंद्रों में किया गया है:

क्र.सं. आर एंड डी केंद्र कार्यकलाप
1 एयरक्राफ्ट आर एंड डी केंद्र, बेंगलूर फिक्स्ड विंग विमान (एलसीए, आईजेटी, यूएवी, एचटीटी-40) का अभिकल्पन एवं विकास
2 रोटरी विंग एयरक्राफ्ट अनुसंधान एवं विकास केंद्र, बेंगलूर रोटरी विंग विमान (एलसीएच, एलयूएच, आईएमआरएच, आरयूएवी) का अभिकल्पन एवं विकास
3 मिशन एवं लड़ाकू प्रणाली अनुसंधान एवं विकास केंद्र, बेंगलूर मिशन प्रणालियाँ, विमान उन्नयन और प्रौद्योगिकी विकास
4 एरो इंजन अनुसंधान एवं विकास केंद्र, बेंगलूर छोटे, मध्यम इंजन और टेस्ट बेड अभिकल्पन (एचटीएफई 25 केएन, एचटीएसई 1200 कि.वै,)
5 सामरिक इलेक्ट्रॉनिक्स अनुसंधान एवं विकास केंद्र, हैदराबाद एवियॉनिक्स मद
6 परिवहन विमान अनुसंधान एवं विकास केंद्र, कानपुर परिवहन विमान का विकास एवं संशोधन/उन्नयन
7 विमान उन्नयन अनुसंधान एवं विकास केंद्र, नासिक रूसी विमानों पर विमान/प्रणाली उन्नयन कार्य
8 एरोस्पेस सिस्टम और उपकरण अनुसंधान एवं विकास केंद्र, लखनऊ मैकेनिकल, हाइड्रॉलिक और इलेक्ट्रिकल सहायक उपकरणों का विकास ।
9 एरोस्पेस सिस्टम एवं उपकरण अनुसंधान एवं विकास केंद्र, कोरवा उड़ान डेटा रिकॉर्डर और प्रदर्शन प्रणाली विकसित करना।
     

एचएएल – आज:

एचएएल में चल रहे विनिर्माण कार्यक्रमों में एसयू-30 एमकेआई, एलसीए और डीओ-228 विमान तथा एएलएच-ध्रुव, चेतक, चीतल और एलसीएच हेलिकॉप्टरों का उत्पादन शामिल है । वर्तमान में चल रहे मरम्मत ओवरहॉल (आरओएच) कार्यक्रमों में जगुआर (अपग्रेड के साथ), मिराज (अपग्रेड के साथ), किरण, एचएस-748, एएन-32, मिग 21, एसयू-30 एमकेआई, हॉक, डॉर्नियर डीओ-228, एएलएच, चीतल, चीता और चेतक शामिल हैं ।

कंपनी सभी पुराने और नए उत्पादों की पूरे कार्यकाल की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रखरखाव और ओवरहॉल सेवाएँ प्रदान करती है । वर्तमान में, 13 प्रकार के विमानों/हेलिकॉप्टरों और इंजनों की ओवरहालिंग की जा रही है । इसके अतिरिक्त, रूसी, पश्चिमी और स्वदेशी डिज़ाइनों के विमानों पर लैस विभिन्न सहायक उपकरणों और एवियॉनिक्स की मरम्मत/ओवरहालिंग की सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं ।

वैश्विक कंपनी बनने के एचएएल के मिशन के अनुरूप, निर्यात को प्रमुख क्षेत्रों में से एक के रूप में पहचाना गया है । एचएएल ने अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को ध्रुव, लांसर, चेतक और चीता हेलिकॉप्टर और डीओ-228 विमान की आपूर्ति की है और उपरोक्त प्लेटफार्मों के लिए उत्पाद समर्थन भी प्रदान कर रहा है । कंपनी ने एयरबस, बोइंग, रोल्स रॉयस, आईएआई, रोसोबोरोनएक्सपोर्ट आदि जैसी वैश्विक विमानन कंपनियों को उच्च परिशुद्धता संरचनात्मक और समग्र कार्य पैकेज, असेंबली, एवियॉनिक्स आदि की आपूर्ति के माध्यम से अपनी विश्वसनीयता स्थापित की है ।

प्रमुख चल रहे स्वदेशी विकास कार्यक्रम में हलका लड़ाकू विमान (एलसीए) एमके 1ए, हलका लड़ाकू हेलिकॉप्टर (एलसीएच), हलका उपयोगिता हेलिकॉप्टर (एलयूएच), बेसिक टर्बोप्रॉप ट्रेनर एचटीटी 40 और भारतीय बहु भूमिका हेलिकॉप्टर (आईएमआरएच) शामिल हैं । एचटीएफई-25 और एचटीएसई-1200 इंजनों का अभिकल्पन एवं विकास भी शुरू किया गया है ।

प्लेटफार्मों के अतिरिक्त, विमान प्रदर्शन प्रणाली, मिशन कंप्यूटर, हेलिकॉप्टरों के लिए स्वचालित उड़ान नियंत्रण और विमान सहायक उपकरण एवं एवियॉनिक्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रौद्योगिकी विकास परियोजनाएं भी शुरू की गई हैं ।